
दुनिया के तमाम डाकखाने प्रेम से चलते है
और कचहरियाँ नफ़रत से।
कोई हैरत नहीं कि डाकखाने कम हो गए
और कचहरियाँ बढती चली गई ।
हम दोनो रोज कम से कम एक चिट्ठी तो एक दूसरे को लिख ही सकते है।
या फिर तुम मुझे कभी कभी कोई किताब भिजवाना❣️।

दुनिया के तमाम डाकखाने प्रेम से चलते है
और कचहरियाँ नफ़रत से।
कोई हैरत नहीं कि डाकखाने कम हो गए
और कचहरियाँ बढती चली गई ।
हम दोनो रोज कम से कम एक चिट्ठी तो एक दूसरे को लिख ही सकते है।
या फिर तुम मुझे कभी कभी कोई किताब भिजवाना❣️।
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